Monday, August 27, 2012

ये कैसी शिक्षा

हाल में एक फि़ल्म देखी-‘बिफ़ोर द रेन्स‘। राहुल बोस और नन्दिता दास की। कहानी अंग्रेज़ों के ज़माने की, पर आज भी प्रासंगिक। सुजानी (नन्दिता दास) एक अंग्रेज़ अफ़सर के घर पर काम करती है। शादीशुदा है। तब भी शादीशुदा अंग्रेज़ अफ़सर से ‘प्यार‘ कर बैठती है। जंगल में दोनों को गाँव के दो बच्चे देख लेते हैं। पति को पता लग जाता है। सुजानी अंग्रेज़ अफ़सर के पास पहुँच जाती है। बात खुलने के भय से अंग्रेज़ अफ़सर अपने ड्राइवर डीके (राहुल बोस) से उसको गाँव से बाहर भेजने को कहता है। दिल टूटने पर सुजानी, डीके के पिस्टल से ख़ुद को गोली दाग लेती है। फि़ल्म तो आगे भी चलती है। अन्त कहीं और होता है, मगर कहानी का मूल सार वही, जो आज शिवानी भटनागर, मधुमिता शुक्ला, कविता चैधरी, भँवरी देवी, अनुराधा बाली ‘फि़ज़ा‘ और गीतिका शर्मा का है। इन सभी ने शादीशुदा मर्दों की जि़न्दगी में झाँका और नतीजतन, ख़ुद ही जि़न्दगी से हार गयीं। जि़न्दगी लूटने वाले कुछ ‘रावणों’ को सज़ा मिली तो कुछ आज भी बाँसुरी बजा रहे हैं-चैन की।
सनातन संस्कारों में दीपावली पर माता लक्ष्मी के साथ श्रीगणेश की पूजा का विधान है। वजह है इसकी। लक्ष्मी आती हैं तो लोग लक्ष्मी पुत्र बन जाते हैं। यानी धन पुत्र, पूँजी पुत्र। पूँजीवाद सत्ता दिलाता है। सत्ता में मदहोशी होती है और मदहोशी में तीन ‘डब्ल्यू‘ का शौक जागता है। तीन डब्ल्यू-वेल्थ, वाइन, वूमेन। वरिष्ठ अधिकारी आर. के. शर्मा, बाहुबली नेता अमरमणि त्रिपाठी, राजस्थान के मदेड़ना, हरियाणा के चन्द्रमोहन और गोपाल गोयल ‘काण्डा‘, सभी को मदहोशी में यही रोग लगा। सबको एक डब्ल्यू-‘वूमेन‘ ने सियासी मैदान से बाहर कर दिया। पुरुष प्रधान समाज में ‘रावणों‘ की गिद्ध दृष्टि की कमी न तो कभी रही है, न है और न रहेगी, लेकिन मातृपूज्य के रूप में स्वीकार्य अपने देश की नारियाँ शिक्षित बन कर यह कौन सा सन्देश देना चाहती हैं। ढाई अक्षर के शब्द के नाम पर शादीशुदा मर्दों के जीवन में शामिल होना आखि़र इन सबने कहाँ से सीखा। शिवानी भटनागर-वरिष्ठ पत्रकार, मधुमिता शुक्ला-कवयित्री, कविता चैधरी-प्रोफेसर, अनुराधा बाली-हरियाणा सरकार की वकील, गीतिका शर्मा-एयर होस्टेस। लोक गायिका भँवरी देवी को छोड़ दें तो ये सभी उच्च सुशिक्षित। तब कमी कहाँ रह गयी स्वच्छ समाज के निर्माण का ताना-बाना बुनने में। आज वह समाज तैयार हो गया है, जिसमें पूनम पाण्डे ट्विटर पर अपने प्रशंसकों की संख्या बढ़ाने के लिए पोर्न स्टार सनी लियोन से प्रतिस्पर्धा करती हैं। भारतीय क्रिकेटरों ने टूर्नामेण्ट जीतना छोड़ दिया। जीतते तो पूनम नंगी हो जातीं। वैसे तब भी हाल में पूनम ने नग्न तस्वीर खिंचा ही डाली।
बहरहाल, बात शुरू हुई थी विवाहेत्तर सम्बन्धों के मकड़जाल से तो इन घटनाओं का मन्थन करने के बाद दो प्रमुख ख़ामियाँ सामने ही नज़र आती हैं। पहली, इनके व इनके परिजनों के कमज़ोर संस्कार और दूसरे, प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा प्रणाली का दोष। बच्चों को संस्कारित करने के लिए ज़रूरी है माता-पिता पहले स्वयं संस्कारित हों। शिक्षा प्रणाली में बदलाव का मुद्दा एक वृहद विषय है। उस पर चर्चा फिर कभी। फिलहाल, दोनों मुद्दों पर जनजागरण आन्दोलनों की ज़रूरत है। पहल का इन्तज़ार है। शेष फिर...

Tuesday, November 15, 2011

धर्म की राजनीति का विरोध क्यों

अक्सर लोग कहते हैं की धर्म की राजनीति नहीं होनी चाहिये, विकास की राजनीति होनी चाहिये. पहली बात तो यह कि जब धर्म की राजनीति नहीं होगी तो क्या अधर्म की राजनीति होगी. जी हाँ! तभी तो आज अधर्म की राजनीति का बोलबाला हो चला है. आज अधिसंख्य व्यक्तियों की ज़ुबान पर यही शब्द रहते हैं, ‘राजनीति बहुत गन्दी हो गई है. राजनीति में तो गुण्डे-बदमाश सफल होते हैं.’ धर्म से तो सतत विकास होता है तो विकास की राजनीति के लिए धर्म की राजनीति को छोड़ देना मेरी समझ से परे की बात है.
गाँधी के अनुयायी कांग्रेसी जब ऐसी नीतियाँ बनाते और उन्हें लागू करते हैं तो वे गाँधी का ही विरोध करते हैं. दो वजहें हो सकती हैं. या तो उन्होंने गाँधी को पढ़ा नहीं या फिर वे गाँधी को मानते हैं, गाँधी की नहीं. गाँधी ने कहा था, ‘धर्म के लिए राजनीति छोड़ देने का कोई सवाल ही मेरे लिए नहीं है…मेरी राजनीति के मूल में भी धर्म ही है. राजनीति में जब मैंने भाग लेना शुरू किया, तब भी उसमें अपने जीवन का नियमन करने वाले इस सिद्धान्त की कभी उपेक्षा नहीं की.’ लेकिन हमें तो कृष्ण, विदुर, रावण की राजनीति पढ़ाई ही नहीं जाती. शुक्र है कि कुछ विश्वविद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों में चाणक्य और गाँधी को जगह दे दी है. गाँधी ने राजनीति में ‘राज’ से अधिक ‘नीति’ को महत्व दिया और ‘रामराज्य’ को अपना आदर्श घोषित किया था. लेकिन हम तो राजनीति विज्ञान पढ़ते हैं, राजनीति शास्त्र नहीं. राजनीतिक दर्शन के जनक प्लेटो का राजनीति शास्त्र समाज, राज्य, नैतिकता, धर्म आदि सभी का सामूहिक अध्ययन है. जब वह ‘आदर्श राज्य’ की बात करते हैं, तो वहाँ राज्य के भावी स्वरूप की ओर इशारा करते हैं. लेकिन परम्परागत राजनीति विज्ञान के पिता अरस्तू ने नीतिशास्त्र को राजनीति से अलग करके राजनीतिक दर्शन के स्थान पर राजनीति विज्ञान को स्थापित किया और उसे वैज्ञानिक मान्यताओं व पद्धतियों का आधार दिया. बस, राजनीति शास्त्र के राजनीति विज्ञान बनते ही राजनीति से धर्म और नैतिकता ग़ायब होती चली गयी. आज के ‘राज’ की ‘नीति’ कुछ ऐसी हो गई है कि कई केन्द्रीय मंत्रियों सरीखे शासक अपने ऐशो-आराम में कोई कमी करना नहीं चाहते, भले लाखों लोगों को दो जून की पर्याप्त कैलोरी भी नसीब न होती हो. क्या देशवासियों के अभिभावक-राजनेता इस दिशा में सोचने के लिए कुछ समय निकालेंगे.

Saturday, November 12, 2011

फेर नज़रिये का है

पत्रकारिता की नई पीढ़ी में जोश है, पर धैर्य के साथ अध्ययन की ललक नहीं. हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जब मालिक मुहम्मद जायसी पर आलोचनात्मक टीका लिखी तो पहले कबीर, सूर, तुलसी के सम्पूर्ण उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया. तभी वह जायसी को कबीर, सूर, तुलसी के साथ स्थापित कर पाये. आजकल ब्लॉग पर हमारी युवा पीढ़ी के जोशीले सदस्य लगातार धर्म और उसके नुमाइंदों को निशाना बना रहे हैं. धर्म मेरा प्रिय विषय है. तब भी मैं अभी तक इस क्षेत्र में हाथ आजमाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता हूँ. वजह, अभी खुद को प्रशिक्षु समझता हूँ और निरन्तर अध्ययन कर रहा हूँ. लेकिन इन ब्लॉगर्स की आलोचनात्मक टिप्पणियों को पढ़कर खुद को रोक नहीं पाया. हमारे एक साथी ने लिखा कि आज के सन्त-महात्मा छुट्टा सांड की तरह घूम रहे हैं. आमजन को लूट रहे हैं. दरअस्ल, उनकी पीड़ा यह थी कि उन्होंने एक महात्मा को एसी कार में बैठकर जाते देख लिया. वह न तो महात्मा जी को जानते थे और न ही उनसे अपनी इस जिज्ञासा के बारे में पूछा ही. बस लौटते ही पहली फुर्सत में ब्लॉग लिख डाला. ऐसे में दो सवाल उठते हैं. एक, क्या सन्त-महात्माओं को फटे और मैले-कुचैले कपड़ों में रहना चाहिए? या फिर दो, क्या एसी कार में बैठने से पहले उन्हें सन्यास का त्याग कर देना चाहिए? इसे मैं एक उदाहरण से समझाने का प्रयास करता हूँ. महर्षि वेद व्यास अपने पुत्र सुखदेव जी महाराज को श्रीमद्भागवत पुराण का ज्ञान देना चाहते थे, ताकि वह जनकल्याण का मार्गदर्शक बन सके. वह खुद ऐसा क्यों नहीं कार सके, इसकी चर्चा फिर कभी करूंगा, क्योंकि चर्चा लम्बी हो जाएगी. फ़िलहाल, विषय पर ही रहता हूँ. सुखदेव जी बचपन में ईश्वर की खोज में वनों में निकल पड़े. व्यास जी उन्हें रोकने के लिए उनके पीछे दौड़े. रस्ते में नदी पड़ी. कुछ स्त्रियाँ निर्वस्त्र होकर उसमें नहा रही थीं. सुखदेव जी नदी पार कार गये और स्त्रियाँ नहाती रहीं. जब वृद्ध व्यास जी नदी पर पहुंचे तो स्त्रियों ने तुरन्त कपड़े खींचकर खुद को ढक लिया. व्यास जी ने पूछा, ‘अभी मेरा पुत्र नदी पार करके गया, तब तो आप नहाती रहीं और अब मुझ वृद्ध ऋषि को देखकर तन ढक रही हैं?’ स्त्रियाँ बोलीं, ‘जो अभी गया, वह तो दीवाना था. उसे तो स्त्री-पुरुष का भेद ही नहीं मालूम तो उससे क्या पर्दा. लेकिन ऋषिवर, आपको तो इसका भान है. आपके सामने हम ऐसे कैसे रह सकती हैं.’ ऐसी सूक्ष्म दृष्टि के सुखदेव जी का दृष्टिकोण भी एक बार भ्रमित हो गया. उन्होंने पिता व्यास जी से पूछा, ‘महलों में रहने और सारे ऐशो-आराम भोगने के बाद भी राजा जनक को विदेह क्यों कहा जाता है?’ विदेह, यानि जिसे देह का भी भान न हो. व्यास जी ने कहा कि इसका जवाब तो खुद जनक जी ही दे सकते हैं. सुखदेव जी, राजा जनक के पास गये और उनसे वही सवाल पूछा. जनक जी मुस्कुराये. उन्होंने एक कटोरे में ऊपर के अन्तिम छोर तक घी भरवाया और उसमें एक बाती जलवा दी. फिर सुखदेव जी से कहा, ‘आप इस कटोरे को हाथ में लेकर पूरा महल देखिये कि महल कितना सुन्दर है, लेकिन कटोरे से एक भी बूंद घी ज़मीन पर नहीं गिरना चाहिए, अन्यथा आप मृत्युदण्ड के भागी होंगे.’ दासों के साथ पूरे महल का चक्कर लगाने के बाद जब सुखदेव जी लौटे तो जनक जी उनसे पूछा, ‘महल कैसा लगा?’ सुखदेव जी ने कहा, ‘महल देखने की नौबत ही कहाँ आई, महाराज. सारा ध्यान तो इस कटोरे पर लगा रहा. मृत्युदण्ड का भय मुझे नहीं था, पर आपकी आज्ञा का पालन मुझे करना था. आज्ञा की अवहेलना कर आपका अपमान कैसे करता.’ जनक जी बोले, ‘जिस तरह पूरा महल घूमने पर भी आपका ध्यान कटोरे पर लगा रहा, उसी प्रकार महल में रहते हुए भी मेरा ध्यान प्रभु के श्रीचरणों में लगा रहता है.’ यह इससे भी सिद्ध होता है कि एक बार राजा जनक के महल में आग लग गयी. दास-दासी अपना सामान लेकर भागने लगे. जनक जी से कहा गया कि महाराज, आपके महल में आग लग गयी है तो जनक जी बोले, ‘जब शरीर ही अपना नहीं है तो महल मेरा कैसे हो गया.’
तो फेर नज़रिये का है. किसी सन्त-महात्मा को एसी कार में मोबाइल पर बात करते देखने से यह सिद्ध नहीं हो जाता कि उन भौतिक वस्तुओं के प्रति उनका मोह है. चरम स्थिति में पहुँचने के बाद वे वस्तुएं तो मात्र साधनभर हैं. वे होंगी तो भी सन्तों को साध्य प्राप्त होगा. नहीं होंगी तो भी वे अपने साध्य को प्राप्त कर लेंगे. एक साधारण सा उदाहरण देता हूँ. एक छात्र को बाइक मिल जाये तो वह उसे हवा की तरह उड़ाएगा और बिना किसी काम के दोस्तों के घर पहुँच जाएगा, क्योंकि उसका उद्देश्य होता है कि लोग और दोस्त उसे बाइक चलाता हुआ देखें. फिर बाइक छीन ली जाये तो वह दोस्तों के घर काम से ही जाएगा, क्योंकि उसका उद्देश्य नष्ट हो चुका होता है. अब किसी नौकरीपेशा व्यक्ति को बाइक दे दी जाये तो वह उसी से नौकरी पर जाएगा. फिर छीन ली जाये तो भी वह नौकरी पर जाएगा, क्योंकि उसका उद्देश्य नौकरी करना है. बाइक तो साधनभर है. तो मेरे भाइयों, सन्त-महात्माओं पर चर्चा करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन निवेदन यह है कि पहले उन्हें और उनके कृत्यों को जान-समझ लें.

Thursday, November 3, 2011

सिरफिरों का ‘गुरु’ प्रेम

सम्मान के योग्य खुशवंत सिंह ने एक आलेख में लिखा था कि अफज़ल गुरु की फांसी को उम्रकैद में तब्दील कर देना चाहिए. उनका तर्क है कि अफज़ल की मौत से कश्मीरी युवकों में विद्रोह फैलेगा, जिसकी परिणति आतंकवाद में वृद्धि के रूप में होगी. ऐसा होने की सूरत में अफज़ल के साथी उसे ताजिंदगी तो ‘तिहाड़’ में रहने नहीं देंगे. 1999 के अफगानिस्तान से विमान अपहरणकांड का रीमेक कर फिरौती के रूप में गुरु को मांग लेंगे. दरअसल, 13 दिसंबर, 2001 के हमले में कोई नेता-मंत्री नहीं मारा गया था. संसद परिसर में नौ बेगुनाह मारे गए थे, अन्यथा गुरु अभी तक रंग-बिल्ला, सतवंत-केहर के परिवार में शामिल हो गया होता.
शहीद भगत सिंह और दुर्दांत अफज़ल गुरु के फांसी प्रकरणों की तुलना की जाये तो अनेक बिन्दुओं पर आज के उन सियासतफरोशों के मुंह से बोल नहीं निकलेंगे, जो गुरु की फांसी को माफ़ करने की वकालत करते हैं. ग़ौर करें, भगत सिंह ने असेम्बली में धमाका किया था. अफज़ल ने संसद पर हमला किया. असेम्बली बमकांड में कोई जनहानि नहीं हुई थी. संसद हमलाकांड में नौ निर्दोष लोगों को परिवारवालों को रोता-बिलखता छोड़कर असमय जाना पड़ा. असेम्बलीकांड में कांग्रेस कोई औपचारिक प्रस्ताव भी नहीं ला सकी थी और अंग्रेजों के भगत सिंह को सजा-ए-मौत के फरमान पर हस्ताक्षर कर दिए थे. लेकिन अफज़ल की फांसी का उसी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री ग़ुलाम नबी आजाद सरीखे नुमाइंदे विरोध करते हैं. बापू ने अपने अहिंसा के मंत्र की सिद्धि के कारण ही भगत सिंह को शहीद होने दिया, मगर हिंसा बर्दाश्त नहीं की, जिसके लिए भारतीय समाज का एक तबका आज तक उन्हें दोषी मानता है. तब खुद को गाँधी का इकलौता वारिस कहलवाने वाले कांग्रेसी अफज़ल की फांसी का विरोथ क्यों करते हैं? क्या अहिंसा का जाप करने वाले महानुभावों की नज़र में गुरु का कुकृत्य हिंसा नहीं? क्या वह अहिंसा की श्रेणी में आता है?

Friday, October 7, 2011

बापू, हम शर्मिंदा हैं


तीन दिन पहले तक सब ठीक-ठाक था। बच्चे, युवा, महिलाएं, बूढ़े, सभी रोजाना के काम निपटाते दिख रहे थे, पर न जाने तराई के गुलदस्ते को किसकी बुरी नजर लग गई कि दंगा हो गया। फिर कफ्र्यू और उसके बाद घरों में जिंदगियां नजरबंद।
शहर में दंगे, अराजकता ने पांव पसारे तो लोग परेशान हो उठे। टिंकू, पिंकू, सोनू, मोनू का स्कूल जाना, गली में क्रिकेट खेलना रुक गया तो युवाओं का डिग्री कॉलेज में कॅरियर की पढ़ाई। जिंदगी के अंतिम पड़ाव का एकमात्र सहारा 'बातचीत' के लिए बुजुर्ग तरसने लगे तो घरों में रहने वाली महिलाएं भी सब्जी आदि लाने को तड़प गईं। बिन व्यापार के व्यापारी परेशान, बिन रोगी के अस्पताल सूने। फरियादी नहीं तो वकील साहब भी खाली और गरीब की तो पूछिए मत।
शहर के हफीज खान बोले, 'हमारे बुजुर्गों ने हमें और हमने अपने बच्चों को तो सही तालीम दी थी, मगर आज के सियासतदांओं के चक्कर में फंसकर न जाने वे क्यों उग्र हो जाते हैं। ऐसा कफ्र्यू पहले कभी नहीं देखा। ऐसी घटनाएं बहुत तकलीफ पहुंचाती हैं।'
चौराहों पर, रोडवेज गेट पर लगने वाली दुकानों पर आजकल रात में चाय की चुस्कियां नहीं ली जा रहीं। चाय की ठेलियां बंद हैं, फिर ग्राहक भी नहीं हैं। गांधी पार्क पर चाय की दुकान चलाने वाले सुधीर वासन कहते हैं, 'रोजाना ढाई-तीन सौ रुपये कमा लेते थे, पर तीन रोज से एक पैसे की कमाई नहीं हुई है।' उसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उसने शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया। बोले, 'साहब, हम तो बापू से शर्मिंदा हैं। उनके जन्मदिन वाले दिन हमारे ही बच्चों ने दंगा-फसाद किया। पता नहीं, हमारी तालीम में क्या कमी रह गई, जो हमारे बच्चे अपने ही देश में अपने ही लोगों के साथ दंगा-फसाद करते फिर रहे हैं।'
(दैनिक जागरण के ऊधमसिंह नगर संस्करण में 5 अक्टूबर, 2011 को प्रकाशित)

Tuesday, August 30, 2011

अन्नागीरी से दूर दिखे साहित्यकार

पूरे 12 दिन, 288 घंटे। 74 साल के बूढ़े आंदोलनकारी का गांधीवादी आंदोलन। देशभर में गांधीवादी हजारे की अन्नागीरी। जनपद के जनपद अन्नामय हो गए। गांव, गली, मोहल्ले, हर तरफ बस अन्ना ही अन्ना। अपने पहाड़ की कुमाऊंनी धरती पर भी लहराते तिरंगे, मैं अन्ना हूं की टोपियों से ढके सिर दिखाई देते रहे। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, धीरे-धीरे समय बढ़ता गया, लोग जुड़ते गए, कारवां दिनोंदिन बड़ा होता गया। रिंकू, टिंकू, सोनू, मोनू पढ़ाई छोड़ एक-दो-तीन-चार, बंद करो ये भ्रष्टाचार के नारे लगाने लगे तो गुरुजी अपने स्तर के गंभीर नारों को आवाज देने लगे। इंसाफ दिलाने वाले वकील साहब, जीवनदाता डॉक्टर साहब मैदान में कूद पड़े तो लायंस जैसे संभ्रांतजनों की संस्थाएं भी इस यज्ञ में आहुति देने को पहुंच गई। व्यापारियों ने एक दिन को कारोबार को तिलांजलि दे दी। अपने कुमाऊं में तो बिजली कर्मी भी यही गाते सुनाई दिए- मिले सुर मेरा-तुम्हारा तो सुर बने हमारा। मगर एक बड़ा ताज्जुब। पूरे आंदोलन में साहित्य जगत में सन्नाटा रहा, घुप्प अंधेरा रहा। समाज के दर्पण-साहित्य के सर्जकों में शून्यता दिखाई दी। कुमाऊं को साहित्य भूमि कहा जाता रहा है। साहित्य नगरी अल्मोड़ा से भी कोई आवाज नहीं उठी। मंडल के अन्य पांच जिलों- नैनीताल, पिथौरागढ़, चंपावत, बागेश्र्वर, ऊधमसिंह नगर, यानी सभी जगहों के साहित्यकार, कवि, शायर शांत रहे। छोटी से छोटी काव्य गोष्ठी और बड़े से बड़े कवि सम्मेलन, मुशायरों में राजनीतिज्ञों के दिल को भेद डालने वाले तीरंदाजों के तरकश तीरविहीन नजर आए। वैसे यह साहित्यिक शून्यता राष्ट्रीय स्तर पर रही। कुमार विश्र्वास ने कवियों को तो आलोचना का भागी बनने से बचा लिया, मगर साहित्यकारों, शायरों में तो कोई हिम्मत नहीं दिखा पाया। इतिहास के पन्नों में तो हमने यही पढ़ा कि जंग-ए-आजादी में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका रही। उन्होंने अपने फन से लोगों को जोड़ दिया, मगर आजादी की इस दूसरी लड़ाई-भ्रष्टाचारके खिलाफ जंग में उनके वंशजों में वह चेतना, वह जागरूकता गायब-सी लगती है। आंदोलन निपट गया। उम्मीद पर दुनिया कायम है। सो हम भी उम्मीद करते हैं कि शायद वे अब इस पर मंथन करने को समय निकाल लें।

Saturday, August 6, 2011

प्रेम के आठ सूत्र

विद्वानों और दार्शनिकों ने धर्म और प्रेम की अनगिनत परिभाषाएँ बतायी हैं। प्रेम क्या है? इस विषय पर विद्वानों और दार्शनिकों ने बहुत से शास्त्रीय विचार दिये हैं। आचार्यों ने प्रेम के आठ सूत्र बताये हैं- श्रद्धा, साधु सत्संग, भजन क्रिया, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, रुजता एवं भाव। प्रारम्भ में श्रद्धा को अटूट बनाना होता है। श्रद्धा का डोलना बहुत बारीक होता है। न जाने किस क्षण मन में श्रद्धा समाप्त होने लगे। ऐसे में बार-बार स्वयं को संभालना पड़ता है कि कहीं ईश्वर के प्रति, गुरु के प्रति हमारी श्रद्धा कम न हो रही हो। इसके लिए साधुओं की संगत आवश्यक है। मन किसी तरह बहके नहीं, वह निर्मल एवं स्वच्छ बना रहे, इसके लिए साधु सत्संग दूसरा सूत्र है। भजन क्रिया मनुष्य को अन्य प्राणियों से अलग करती है। मानव के पास बुद्धि है, विवेक है, जो अन्य जीव-जन्तुओं को उपलब्ध नहीं। इसलिए प्रभु भजन तीसरा सूत्र है। अब निष्ठा पर ध्यान देना होता है। साधु संगत की अथवा भजन करने लगे, लेकिन ऊपरी मन से तो प्रेम का अनुभव सम्भव नहीं। अत: प्रेम को पाने के लिए निष्ठा से इन मंत्रों की सिद्धि आवश्यक है। आचार्य कहते हैं कि इन सूत्रों के साथ रुचि की वृद्धि आवश्यक है। अध्यात्म में गोते लगाने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अपनी रुचि को मार ले। रुचि की वृद्धि होनी चाहिए। प्रभु को, प्रेम को पाने के लिए अपनी रुचि के अनुसार मार्ग का चयन करना चाहिए। इसी प्रकार आसक्ति की वृद्धि भी बहुत ज़रूरी है। प्रभु को पाने के लिए, प्रेम को जानने के लिए आसक्ति होनी चाहिए, जुनून होना चाहिए, उसमें डूबे रहना चाहिए। सातवाँ सूत्र है रुजता। इस पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है कि कहीं ये सारे कार्य करते-करते हमें अहंकार न हो जाए। यह अहंकार न हो जाए कि मैं साधुओं की अधिक संगत करता हूँ अथवा मैं प्रभु के अधिक भजन करता हूँ और वह कम। आचार्य अखण्डानन्द सरस्वती कहते हैं कि काम, क्रोध, लोभ को मारने की आवश्यकता नहीं, उन्हें शान्त कर दो। शास्त्रों में वैधव्य को गंगा स्वरूपा कहा गया है। उग्र से उग्र धर्म नारी भी विधवा होकर शान्त, सहज, सरल हो जाती है। काम पत्नी है कामना की, तो कामना को मार दो, काम विधवा हो जाएगा। क्रोध पत्नी है हिंसा की, तो मन में हिंसक प्रवृत्तियों को मार देने से क्रोध विधवा हो जाएगा और लोभ पत्नी है तृष्णा की, तो तृष्णा यानि सांसारिक वस्तुओं को पाने की प्यास को मारने से लोभ विधवा होगा। इस प्रकार सूक्ष्म से सूक्ष्म अहंकार को दूर किया जा सकता है। तो रुजता यानि शान्त स्वभाव, सहजता, सरलता आवश्यक है। अब अन्त में बारी आती है भाव की। यह अन्तिम सूत्र है। मन में भाव का होना परम आवश्यक है। जब तक भाव ही नहीं होगा तब तक प्रेम को अनुभव कैसे किया जा सकता है। और जब आप इन आठों सूत्रों, मंत्रों को सिद्ध कर लेंगे तब आपको लगेगा कि प्रेम तो मन के भीतर ही है। इन आठों सोपानों को पार करने के बाद प्रेम स्वत: प्रस्फुटित होने लगेगा और तब आपको पता लगेगा कि प्रेम ही तो ईश्वर है। ईश्वर भी मन के भीतर ही है। जब इन सूत्रों को पूरा कर लेंगे तो आत्म साक्षात्कार होने लगेगा और परमात्मा से साक्षात्कार होने लगेगा।